एक था मोहन : A review by Ravish Kumar

एक था मोहन

बुतों से दरक कर गांधी से मोहन को निकलते देखना है तो ज़रा इस क़िताब को उठाइये। कोई 86 पन्नों के बाद मोहन का जीवन आपके बच्चों के बचपन का हिस्सा हो जाएगा। सोमेश कुमार के रेखाचित्रों से निकल कर दौड़ते भागते और सहमते गांधी का मन समझना है तो सोपान जोशी की लिखी इस किताब को सर्दी ख़त्म होने से पहले किशोर होते अपने बच्चों को पढ़ कर सुनाइए या पढ़ने दीजिए। पचास रुपये की यह क़िताब आई टी एम यूनिवर्सिटी, ग्वालियर ने छापी है।

आ तो गई थी दो अक्तूबर को ही मगर सोपान से आज मिली। देखते ही आँखों में चमक पैदा हो गई। क्या छपाई है और क्या लिखाई है। लाजवाब।

गांधी को न भी जानो तो भी लगता है सब जान चुके हैं। थोड़ा भी जानो तो लगता है अब क्या जानना है। गांधी को जानना जयंती और पुण्यतिथि की तारीख़ को याद रखने में सिमट गया है। इस किताब में गांधी नए नए से लगते हैं।

जब भी 15 अगस्त आता है, देश के लाखों शिक्षक इस समस्या से गुजरते हैं कि तिरंगा लिए नाचते गाते बच्चों को कैसे समझाए ग़ुलामी और आज़ादी का मतलब। गांधी या अंबेडकर या किसी भी ऐतिहासिक भूमिका वाले शख्स को लेकर ऐसा संकट आता है। सोपान ने उन लाखों शिक्षकों का काम आसान कर दिया है। रेखाचित्र भव्य हैं। जैसे गांधी को हम सब अपनी आँखों से चलते फिरते देख रहे हों ।

मोहन एक साहसी बालक नहीं था। इस पंक्ति से यह किताब अपना पहला क़दम बढ़ाती है। पहुँचती है उस कक्षा में जहाँ भूगोल में फेल होने वाला मोहन दुनिया के भूगोल पर बदलाव की रेखा खींचने के लिए अपनी कमज़ोरियों को सहेज रहा था। 34 छात्रों में 32 वें नंबर पर आने वाला हमारा मोहन हमारे भारत के जैसा लगता है। हर पायदान में सबसे नीचे।

सोपान कहते हैं कि गांधी का होना दुनिया में साधारण के होने की गुज़ाइश है। आप इस किताब को पढ़िएगा। बच्चों के साथ और ख़ुद को बच्चा बनाए रखने के लिए।

बिहार सरकार का यह प्रोजेक्ट रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसके लिए बधाई के पात्र हैं। अक्सर सरकारें घंटिया किताबें निकालती हैं। जिस किसी ने इस किताब के लिए सोपान से संपर्क किया होगा, उसने अपने जीवन में एक अच्छा काम किया है। पता चला है कि अब यह किताब बिहार के हर बच्चे के हाथ में पहुँचने जा रही है। उससे पहले मैं इसे आप तक पहुँचा रहा हूँ।

-Ravish Kumar

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